Thursday, March 4, 2010

                                तमन्ना

खुली जब आँख दुनिया में, बहुत रोया था मै
   छूटा था गर्भ माँ का, जहा निश्चिंत होकर सोया था मै,
अपनी तरफ बुलाती पुकारती रिश्तो कि उस भीढ़ में
  उन अजनबी आवाजो के शोर से बहुत परेशान था मै

मगर उन नए रिश्तो में जो छुपे थे स्वार्थ उनके 
    उन स्वार्थो की गहराइयों से तो बिलकुल अन्जान था में 
     यहाँ हर किसी ने देखा अधिकार अपना, हर किसी ने बताया कर्तव्य मेरा,
      में भी था घिरा उनके उन झूठे आदर्शो में,  वाकई में कितना नादान था में 

किसी ने दिखाया कोई रूप भगवान का,  किसी और ने कुछ और दिखा दिया
     किसी ने कहा यह है शुभ,  कोई बोला नहीं ये है अशुभ इस सबसे परेशान था में
      मेरे बारे में हर किसी ने जब चाहा कर दी भविष्य वाणी अपनी कुछ अछा तो कुछ बुरा कह दिया
         जयदातर  बुरा तो सच हो गया और इन्तजार मै अछे की  करता रह गया

तोढ़ कर मेरी तमनाए पूरी की तमनाए दुनिया ने अपनी
   अब यह आलम है की तमना करना भूल चुका हूँ मै
      अब बस आखरी तमना है की कोई और तमना न सजे
         क्यों की जिन्दगी को एक सजा समझता हूँ मै

अब कोई तमना नहीं एक गुजारिश है भगवान तुमसे
  मेरे जीते जी नहीं तो मेरे मरने के बाद
      हटाकर नकाब उन चहेरो से दिखा देना असलियत उनकी
        जिनकी वजह से तुम्हारी मदद से भी महरूम रहा हूँ मै  II

                 लेखक     प्रवीण चंदर झांझी  

Saturday, January 9, 2010

                       मेरी ह्रदय वेदना (PAIN OF MY LIFE OR SUCIDE NOT)
 हो जाता हूँ मै बहुत  परेशान
   न जान पाता मै वो राज जब
     जानते है मेरे बारे मै जो सब

हो जाता हूँ मै बहुत बेचैन
  जब करता हूँ  महसूस मै कि
   कर रहा है कोई खरीदो फरोख्त मेरी

हो जाता हूँ मै बहुत हैरान
  जब मेरे देखते देखते बदल देते हो
   दृश्य किसी चल चित्र की तरह

आखिर क्यों तुमने
    बांध रखा है मुझे
     पूर्ती के लिए अपने स्वार्थो की

आखिर क्यों हरा देते हो
 मेरी सचाई की हर बात को
  चल के चाल अपनी चलाकी की

आखिर क्यों कर दिया नष्ट
  मेरे आदर्शो के महत्व को
   जो थी आधारशिला मेरे जीवन की

आखिर क्या मिला तुम्हे छीनकर
 मेरे जीवन की जमा पूंजी मेरा विश्वास
   कि मेने जो भी जीवन मै किया वो तुम्हारे अछे के लिए किया

आखिर क्यों दुत्कार दिया मुझे
  नकार के मेरे जीवन की मेहनत को
   जीवन के इस मुश्किल मोढ़ पर ठहराकर गलत मुझे

आखिर क्यों खेलते हो
  श्रदा विश्वास से मेरे करने को
   पूर्ण अपनी वास्नाए घिनोनी सी

आखिर कब तक डालते रहोगे
  बुराईया अपने रिश्तो की
   करके मुझ निर्दोष की रुस्बियो भी

आखिर कब तक तोढ़ते रहोगे
  आतंम विश्वास की डोर  को मेरे
   करने को संतुष्ट भावना अपने अहंकार की

काश मै जान पाता
  रहस्य अपने जीवन का
   जान पाता क्यों चाहते हो तुम ऐसा

क्यों नहीं तुम चाहते
    की  मै भी जीयू  जीवन
       एक साधारण व्यक्ति का

क्यों तुम नहीं मानते
  कि जिया है अब तक जीवन
   मेने अपने आदर्शो  का

क्यों तुम महसूस नहीं करते
  कि जब तक थी हिम्मत मुझमे
   कि हर कोशिश मेने तुम्हारी ख़ुशी के लिए

क्यों तुम्हारा दिल नहीं करता
  कि करो कुछ  तुम भी
   मेरी ख़ुशी के लिए      
  
पर क्या  तुम  बदल पाओगे
 विधि के इस विधान को
क्या तुम झूठला पावोगे
मेरे विश्वास के भगवान को

क्या तुम रोक पाऔगे मेरे
मौत के बाद कि मेरी मुस्कान को
अलविदा कहता हुआ मै तो
हँसता हुआ चला जावूगा

मत याद करना मुझे वर्ना
मै तुम्हे आकर  याद बहुत तढ़प ऊँगा
कयोंकि  तब न  छुपा पाओगे कोई राज मुझसे
और मै अपने जीवन के हर राज को जान जाऊंगा    II

             लेखक प्रवीन चंदर झांझी     
         
          
     
      
   

Tuesday, January 5, 2010

                                     कढ़वा सच (HARD FACT)

कहने को तो एक है दुनिया पृथ्वी पर
  वेसे हर एक जिन्दगी मै एक अलग दुनिया बसती है
     किसी की दुनिया मै हँसते हुए भी रोती है जिन्दगी 
        और कंही पर रोते रोते भी ये  हंसती है 
               किसे के रात दिन भरे है तन्हाईयो से
                कही हर रोज़  एक नई महफ़िल सजती है

ए मालिक ये दुनिया भी तेरी ये जिन्दगी भी तेरी
    फिर ये दुनिया न जाने किस बात पे मचलती  है 
      आगे बढ़ो खूब बढ़ो पर इस तरह बढ़ो की
           हर हमसफर से हाथ मिलाकर बढ़ो
             क्योंकि अगर कभी गिरने लगोगे  तो
               सम्भालने वाले हाथो की जरूरत बहुत पढ़ती है
         
यही पहुँच कर  आती है समझ जिन्दगी की
    कयोंकि यही आकर दुनिया रंग बदलती है
       तभी समझता है इन्सान नहीं है दुनिया अपनों की
         यह तो बस  स्वार्थो की बेरहम बस्ती है
            नहीं संभालती दुनिया गिरने वालो को
             बस यह तो गिरने वालो पर खिलखिलाकर हंसती है

सच जिन्दगी का यही है की
 अकेला आया, अकेला है और अकेला जायेगा तू
   एक शून्य से शुरू होकर एक शून्य तक ही तेरी हस्ती है
    जब आयेगी चलने की बारी तब जानेगा तू
      क्या खोया क्या पाया और क्या लेजाएगा तू इस दुनिया से
       अरे जाने वाले कोयह दुनिया तो  आखरी समय मै कपढ़ा भी फाढ़ कर ढ़कती  है   II


              लेखक    प्रवीन चंदर झांझी 
                                  यथार्थ (REALITY)
उढ़ लो जितना उढ़ना है
   मगर वापिस लोटकर यही आना है
      घोंसले आकाश में नहीं बनते
        आखिर बनाना जमीन पर ही आशियाना है

पेढ़ हो चाहे ऊँचा जितना
  आधार उसे फिर भी धरा को ही बनाना है
     आज वक़्त की बुलंदियों पर हो तुम
       लगता है तुम्हे की कदमो में तुम्हारे यह जमाना है

आज तुम हो जहाँ कल मै था वहा
  कल होगा कोई और यहाँ यही इस जीवन का अफसाना है
    डूबते सूरज की लाली समझाती है तुझे
      हो गयी शाम अब तुम्हे घर जाना है

थोढ़ी देर मै आकाश को ढक लेगा अंधकार
  तब दिशा का ज्ञान भी तुम्हे कहा रह जाना है
    सफलता के आकाश मै भूल जाते है जो जमीन को
       पढ़ता उन्हें फिर पीछे से पछताना है

तभी तो कहते है
  मत भूलो उस समय को
   जब छोढ़कर सब कुछ यही
     आखिर मिटटी मै मिल जाना है  II

              लेखक    प्रवीन चंदर झांझी       

Monday, January 4, 2010

                          व्यापर या व्यव्हार ( BUSINESS OR RELATIONS)

व्यापार तो बना था व्यवहार के लिए
   मगर अब यह आलम है की हर चीज़ का व्यापार होता है
     व्यवहार को तो भूल गया इन्सान
        अब तो हर बात में उसकी व्यापार होता है

रिश्तो का खूब होता है व्यापार
  मतलब का हर तरफ सजा बाज़ार होता है
    स्वार्थ हो जब तब होता है रिश्ता
       निस्वार्थ रिश्तो से तो हर कोई बेजार होता है

भावनाओ का भी दुनिया में होता है व्यापार
   स्वार्थ वश ही भावनाओ का इज़हार होता है
     दौलत वालो की वेश्या को भी अपना लेती है दुनिया
        नव नवेली दुल्हन सा उससे व्यवहार होता है

जिन्दगी स्वार्थ की दुनिया में है क्या चीज़
   जिन्दगी से तो यहाँ हर रोज़ खिलवाढ़ होता है 
     दौलत की अंधी दुनिया के बाशिंदों मत करो व्यव्हार का व्यापार 
       व्यवहार ही तो जीवन का आधार होता है

याद रखो जब मूंदेगी आंख छुटेगी सांस 
   जानोगे तब की जीवन के इस कुरुशेतर में 
      कही व्यवहार का ही तो तुने नहीं  कर दिया व्यापार 
         क्योंकि उस दुनिया में व्यापार नहीं सिर्फ व्यवहार होता है  II 

                    लेखक     प्रवीन चंदर झांझी
                                         अपने (OURS)
अपनों ने दिए कुछ जखम वो
   जो न भरते है न फटते है 
      बस रिसते रहते है 

संग तुम्हारे जो बिताये कल 
  वो न भूलते है न जाते है 
      बस मेरे आज में अटके बैठे है 

तुम्हारे जुल्मो की दास्ताँ किससे कहे
    हम तो न हँसते न रोते है
     बस सिसकते रहते है

सुख के दिनों में साथ रहे  हर ख़ुशी मेरे साथ बांटी
   पर वक़्त बदलते ही बदल ली नज़र
     उन रकीबो को ही दुनिया वाले अपने कहते है   II


                          लेखक     प्रवीन चंदर झांझी  

Sunday, January 3, 2010

                                     आज  (TODAY)

तुम तो कुछ पल की तन्हाई से घबरा गए
  हमारे तन्हाई के शनो का तो कोई हिसाब नहीं
    दुनिया के सागर में बहे थे हम
       कब बनकर लहर यह तो कुछ याद नहीं

अब तो किनारे पर पढ़े है
समुंदर के बनकर निशचल चट्टान
  हिला देता है कोई बैठकर हम पर वर्ना
   जीवन का तो हममे कोई एहसास नहीं

घने पेढ़ की जढ़ की गांठ से है हम
  किसी आंधी से हिलती है जब टहनिया
    छूती है तब धूप हमको, मगर सही कितनी है धूप
     करने को घना इस पेढ़ को, इसकी तो कंही बात नहीं

चाहें हो लहर या चट्टान या फिर गांठ
   तन्हाई में अपनी सोच सकता है
      सिर्फ गुजरे कल की बात क्योंकि
      पास उसके अपने अपना कोई आज नहीं  II

                  लेखक   प्रवीन चंदर झांझी