कढ़वा सच (HARD FACT)
कहने को तो एक है दुनिया पृथ्वी पर
वेसे हर एक जिन्दगी मै एक अलग दुनिया बसती है
किसी की दुनिया मै हँसते हुए भी रोती है जिन्दगी
और कंही पर रोते रोते भी ये हंसती है
किसे के रात दिन भरे है तन्हाईयो से
कही हर रोज़ एक नई महफ़िल सजती है
ए मालिक ये दुनिया भी तेरी ये जिन्दगी भी तेरी
फिर ये दुनिया न जाने किस बात पे मचलती है
आगे बढ़ो खूब बढ़ो पर इस तरह बढ़ो की
हर हमसफर से हाथ मिलाकर बढ़ो
क्योंकि अगर कभी गिरने लगोगे तो
सम्भालने वाले हाथो की जरूरत बहुत पढ़ती है
यही पहुँच कर आती है समझ जिन्दगी की
कयोंकि यही आकर दुनिया रंग बदलती है
तभी समझता है इन्सान नहीं है दुनिया अपनों की
यह तो बस स्वार्थो की बेरहम बस्ती है
नहीं संभालती दुनिया गिरने वालो को
बस यह तो गिरने वालो पर खिलखिलाकर हंसती है
सच जिन्दगी का यही है की
अकेला आया, अकेला है और अकेला जायेगा तू
एक शून्य से शुरू होकर एक शून्य तक ही तेरी हस्ती है
जब आयेगी चलने की बारी तब जानेगा तू
क्या खोया क्या पाया और क्या लेजाएगा तू इस दुनिया से
अरे जाने वाले कोयह दुनिया तो आखरी समय मै कपढ़ा भी फाढ़ कर ढ़कती है II
लेखक प्रवीन चंदर झांझी
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