भुगतान (PAYMENT)
भावनाओ में फंसा इन्सान
निकलना चाहता है पकढ़कर
कभी कर्तव्य कभी अधिकार की बाहं
बिना कर्तव्य के अधिकार की करना बात
है न सिर्फ समाज के लिए
बल्कि स्वयं के लिए भी एक गुनाह है
होते है अधिकार ही कर्तव्यो का आगाज
मगर जानकर भी नहीं जानना चाहता है
यह आज का आधुनिक इंसान
महत्वकान्शाओ के लगाकर पंख
उढ़ते उढ़ते जब हो जाता है परेशान
तो नीचे देखने पर भी नहीं दिखते अपने कोई निशान
महत्वकान्शाओ अपेशाओ और अधिकारों का है गुमान
पर भूल गया शायद कर्तव्यो को ऐ अनजान
मत बन तू इतना नादान
क्योंकि थक जायेगा जब भरकर अधिकारों की उढ़Iन
आना होगा जमीन पर कर्तव्यो की,
मिटाने को अपनी थकान
याद रख भरेगा जब तो अंतिम उढ़ान
क्या पाया क्या खोया यह होगा हिसाब तेरा
मूल्य कर्तव्य के तब तू जायेगा जान
फिर लेगा शायद जनम इक बार
तेरे पिछले कर्म होंगे तेरे नवजीवन का आधार
होगा करना तुझे अपने कर्मो का भुगतान II
लेखक प्रवीन चंदर झांझी
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