आज (TODAY)
तुम तो कुछ पल की तन्हाई से घबरा गए
हमारे तन्हाई के शनो का तो कोई हिसाब नहीं
दुनिया के सागर में बहे थे हम
कब बनकर लहर यह तो कुछ याद नहीं
अब तो किनारे पर पढ़े है
समुंदर के बनकर निशचल चट्टान
हिला देता है कोई बैठकर हम पर वर्ना
जीवन का तो हममे कोई एहसास नहीं
घने पेढ़ की जढ़ की गांठ से है हम
किसी आंधी से हिलती है जब टहनिया
छूती है तब धूप हमको, मगर सही कितनी है धूप
करने को घना इस पेढ़ को, इसकी तो कंही बात नहीं
चाहें हो लहर या चट्टान या फिर गांठ
तन्हाई में अपनी सोच सकता है
सिर्फ गुजरे कल की बात क्योंकि
पास उसके अपने अपना कोई आज नहीं II
लेखक प्रवीन चंदर झांझी
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